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Saturday, March 28, 2026

पद्मश्री प्रह्लाद सिंह टिपानिया LIVE जरगा जी पलासमा जागरण 2026

 


🕉️ पद्मश्री प्रह्लाद सिंह टिपानिया LIVE भजन संध्या 2026 | जरगा जी पलासमा जागरण

📜 हार्दिक आमंत्रण

रिखिया समाज के समस्त बंधुओं एवं बहनों को सादर आमंत्रित किया जाता है कि दिनांक 2 अप्रैल 2026 (गुरुवार) को श्री जरगा जी नया स्थान, पलासमा में एक भव्य धर्म जागरण एवं भजन संध्या का आयोजन किया जा रहा है।
यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति और सामाजिक एकता का महासंगम है, जहाँ हजारों श्रद्धालु एक साथ भक्ति में लीन होंगे।
🎤 विशेष आकर्षण – भजन सम्राट का आगमन
इस पावन अवसर पर देश के प्रसिद्ध कबीर भजन गायक
पद्मश्री प्रह्लाद सिंह टिपानिया 
अपनी मधुर वाणी से भजनों की प्रस्तुति देंगे।
उनके भजन सुनने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुँचते हैं। यह कार्यक्रम भक्तों के लिए एक अद्भुत और यादगार अनुभव बनने वाला है।
🚩 महामेघ धर्म जागरण यात्रा
इस आयोजन के साथ-साथ महामेघ धर्म जागरण यात्रा भी आयोजित की जा रही है, जो
📍 30 मार्च 2026 को भीलवाड़ा से प्रारंभ होकर
📍 2 अप्रैल 2026 को पलासमा पहुँचेगी
इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य है:
समाज में जागरूकता फैलाना
सांस्कृतिक परंपराओं को मजबूत करना
एकता और भाईचारे को बढ़ावा देना
इस यात्रा में संत-महात्मा, साहित्यकार, कलाकार और समाज के कई प्रमुख व्यक्ति शामिल होंगे।
📅 कार्यक्रम का पूरा विवरण
📍 स्थान: श्री जरगा जी नया स्थान, पलासमा
📆 दिनांक: 2 अप्रैल 2026 (गुरुवार)
⏰ समय:
🏵️ धर्म जागरण यात्रा का स्वागत – शाम 5 बजे
🍛 भोजन प्रसाद – शाम 6 बजे से
🎶 विशाल भजन संध्या (LIVE) – रात 8 बजे से
🤝 आयोजनकर्ता
जरगा जी विकास ट्रस्ट, नया स्थान (पलासमा)
सर्व मेघवाल समाज
📍 तहसील – सायरा
📍 जिला – उदयपुर (राजस्थान)
📞 संपर्क सूत्र
99834 85427
9982440033
9783262096
9549387331
9610716875

Monday, September 5, 2016

Jarga Ji (मेघवंशी जरगा जी)


❖═══ ✨ मेघवंश भक्त शिरोमणि संत जरगाजी का पावन इतिहास ✨ ═══❖








धन  दौलत ना चाहिए , ना  चाहिए  घर -बार। 
केवल जरगा नाम हो , अलख  का आधार ॥  

-:जय मेघ महा धर्म :-


संत जरगाजी: त्याग और अटूट भक्ति की प्रतिमूर्ति

​अरावली की दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित जरगाजी मेघवंश के परम भक्त शिरोमणि की पावन कर्मभूमि है। लोक मान्यताओं के अनुसार, आज से करीब दो हज़ार वर्ष पूर्व (संवत् 93, ज्येष्ठ सुदी बीज, शनिवार) उदयपुर जिले के सायरा क्षेत्र के गायफल गांव में श्री जोग रिख जी (वागोणा) और माता रंगी बाई मेघवाल के घर संत जरगाजी का जन्म हुआ।

विवाह का त्याग और वैराग्य:

जब जरगाजी विवाह योग्य हुए, तो उनकी बारात कुम्भलगढ़ के काकरवा ग्राम पहुंची। परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। जरगाजी ने सांसारिक बंधनों को त्यागते हुए विवाह से इनकार कर दिया और जिस कन्या (हिमी बाई) से उनका विवाह होना था, उन्हें अपनी 'धर्म बहन' बनाकर बारात वापस लौटा दी। इसके पश्चात वे अलख-धणी की खोज में निकल गए।

अलख धणी का मिलन और वरदान:

फाल्गुन बदी चौदस के दिन, नरवर के जंगलों (गुंदाली) में उन्हें स्वयं अलख धणी के दर्शन हुए। भगवान ने परीक्षा स्वरूप अपना घोड़ा जरगाजी को थमाया और कुछ देर में लौटने को कहा। जरगाजी उसी स्थान पर निरंतर 12 वर्षों तक घोड़ा थामे खड़े रहे। उनके इस अपार समर्पण को देख अलख धणी प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा। जरगाजी ने उत्तर दिया:

"धोम धणियो री, नाम जरगा रो।" (अर्थात: यह धाम अलख धणी 👣 आपका रहे और नाम मेरा रहें।)


​तब अलख भगवान ने कहा कि आज से मेरे नाम से आगे तेरा नाम आएगा। इसी आशीर्वाद के बाद वे "जरगा रा धणी" कहलाए और उस क्षेत्र का नाम जरगा पर्वत पड़ा। यहीं पलासमा के समीप उन्होंने जीवित समाधि ली। मेघ संत जरगा जी की समाधि पर मेघवाल समाज के लोग नित्य पगलिया 👣 की पूजा करते आए है।

महाराणा कुम्भा से संबंध:

इतिहास के अनुसार, महाराणा मोकल को जरगाजी की समाधि पर संतों के आशीर्वाद से ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। कलश (कुंभ) के आशीर्वाद से जन्म होने के कारण बालक का नाम कुम्भा रखा गया। आगे चलकर महाराणा कुम्भा ने ही यहाँ पाषाण की भव्य छतरी का निर्माण करवाया।

जरगा रा धणी






रागु पीर (रघुनाथ पीर): चमत्कारों के स्वामी

श्री रागु पीर राजस्थान के उन महान संतों में से एक हैं जिन्होंने अपनी भक्ति और चमत्कारों से समाज में अहिंसा और धर्म की स्थापना की।

जन्म और गुरु दीक्षा

​रागु पीर का जन्म उदयपुर जिले के सायरा क्षेत्र के गायफल गाँव में श्री जोमा बा वागोणा एवं माता मनु बाई मेघवाल के यहाँ हुआ था। बाद में, वे समीपवर्ती जैतारण गाँव के केरा बा और जेती बाई के यहाँ गोद चले गए। उनकी आध्यात्मिक शिक्षा पलासमा गाँव के पद्मा जी रिख के सानिध्य में हुई, जिन्हें रागु पीर जी ने अपना बालगुरु माना।

कर्म और सिद्धियाँ: चलती दीवार का चमत्कार

​रागु पीर जी एक कुशल बुनकर और कारीगर थे। वे निर्माण कार्य के लिए गोड़वाड़ क्षेत्र के ढालोप जाते थे। जब घाणेराव सरकार ने उनसे 'खाणी' (टैक्स) माँगा, तो उन्होंने इसे देने से इनकार कर दिया। क्रोधित होकर दीवान ढालोप के लिए निकले। उस समय रागु पीर एक दीवार की चिनाई कर रहे थे। उन्होंने दीवार को ही दीवान की अगवानी के लिए चलने को कहा।

अद्भुत चमत्कार: वह निर्जीव दीवार नाडोल की ओर चलने लगी। दीवार पर बैठकर आते देख दीवान का अहंकार टूट गया और उन्होंने ढालोप नाथों की गादी रागु पीर जी को सौंप दी।


जरगा पर्वत पर चमत्कार और अहिंसा का संदेश

​रागु पीर हर माह की शुक्ल बीज को भजन करने जरगाजी नया स्थान धाम आते थे। एक बार जरगाजी पर्वत पर संतों ने उनकी परीक्षा ली:

  • सूखे आम को हरा करना: संतों ने एक सूखे आम के पेड़ को हरा करने की चुनौती दी। रागु पीर ने अपनी भक्ति के बल पर उस सूखे पेड़ को तुरंत हरा-भरा कर दिया।
  • बलि प्रथा का अंत: उस स्थान पर कालिका माता के नाम पर बकरे और पाड़े की बलि दी जाती थी। रागु पीर जी ने अपनी शक्ति से बकरे को बकरी और पाड़े को भैंस बना दिया, जिससे वहां बलि प्रथा समाप्त हुई।
  • पंचामृत और साक्षात् गंगा: उन्होंने शराब को दूध बना दिया और उसका पंचामृत बनाकर संतों को पिलाया। संतों के हाथ धोने के लिए उन्होंने आह्वान करके गंगा प्रकट करवा दी। वहां गंगा कुंड से 16 कलश भरे गए। एक कलश जरगाजी की समाधि पर रखा गया और बाकी 15 कलशों से सप्तधान (सात अनाज) पकाकर प्रसाद बनाया गया।

भविष्यवाणी और मेलों की परंपरा

​आज भी जरगाजी के मेले की रात 'गंगा वेरी' से कलश भरने की परंपरा है जो भविष्य का संकेत देती है:

  1. बारिश का संकेत: यदि पूरे 16 कलश भर जाते हैं, तो अच्छी बारिश होती है। कलश खाली रहना कम बारिश का संकेत है।
  2. फसल का संकेत: सप्तधान में से जो अनाज सबसे ज्यादा पकता है, उसकी फसल उस वर्ष खराब होने का भय रहता है, और जो ठीक पकता है, वह फसल अच्छी होने का संकेत है।
  3. मेला: यहाँ हर साल फाल्गुन बदी चौदस के दिन से मेला भरता है।

जीवित समाधि और छतरी

​रागु पीर जी ने ढालोप में जीवित समाधि ली थी। जिस आम के पेड़ को उन्होंने हरा किया था, वह संवत् 2008 में गिर गया। इसके पश्चात वैशाख सुदी सप्तमी, बुधवार संवत् 2012 को वहां रागु पीर जी की छतरी बनवाई गई। यहाँ आज भी ढालोप से आने वाली 'सेवा' विराजित होती है।

-: जय श्री रागु पीर जी :-

-: जय मेघ महा धर्म :-

-: जय जरगा रा धणी :-










-:बिना सवार घोड़े की पूजा से जरगाजी संबंध:-
















अलख धणी की सेवा जेमली दिनांक- 01 मार्च 2022






नमस्कार आप सभी मित्रों के बीच में मैं एक जानकारी प्रस्तुत करना चाहता हूं, मेघवाल समाज के मंदिरों में मार्बल पत्थर पर बने पद चिन्हों के अलावा कपड़े का बिना सवार का घोड़ा विस्थापित होता है, इसी प्रकार मेघवाल समाज के बच्चे स्त्री-पुरुष कोई भी अपने गले में लॉकेट या फुल पहनते हैं, जिस पर पदचिन्ह या बिना सवार का घोड़ा बना हुआ होता है बहुत सी जानकारी के अनुसार यह घोड़ा रामसापीर का बताते हैं, मैं उनसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं क्योंकि रामसा पीर का इतिहास मात्र 600 साल पुराना ही है तो यह बताओ यह घोड़ा रामसा पीर का कैसे हुआ?? बिना सवार के घोड़े की पूजा-अर्चना रामसापीर के जन्म से पूर्व भी की जाती है लेकिन सच्चाई यह है कि बिना सवार का घोड़ा मेघराजाओं का प्रतीक धार्मिक मान्यता का प्रतीक है और उसी मान्यता को संजोए रखने के लिए मेघवाल समाज अपने गले में ऐसे फूल धारण करता रहा है और मंदिरों में भी बिना सवाल के घोड़े की पूजा करता आ रहा है जिसे बाद में रामसा पीर का प्रतीक बता दिया। यह प्रत्येक तो मेघवंश का विरासत है क्योंकि मैं एक शासक बुद्ध के अनुयाई थे । इसलिए बुद्ध के पदचिन्हों की पूजा की तरह बिना सवार का घोड़ा का मेक शासक अलख धणी का हैं इसलिए बुद्ध के पदचिन्हों की पूजा की जाती है जिन्हें अलख धणी की पूजा भी कहा जाता है। भगवान बुद्ध मानव कल्याण के लिए संपूर्ण मानव जगत को दुःख दूर करने का रास्ता बताने के लिए राज्य से जीवन को त्याग कर ज्ञान प्राप्ति के लिए निकले थे। अपने अपने घोड़े का सवार होकर निकले थे, विश्व इतिहास की एक अति महत्वपूर्ण घटना को महाभिनिष्क्रमण कहते हैं। महात्मा बुद्ध शाक्य वंश के थे।
           अपने राज्य की सीमा पार करने के बाद सारे राज्य वस्त्र गहने आदि त्यागकर केश तलवार से काट दिए थे। इस समय उन्होंने उस प्रिय घोड़े कंथक को अपने साथ के छन्न को सौंप दिया था, ताकि वह वापस कपिलवस्तु चला जाए। सारथी छन्न सिद्धार्थ को बहुत सम्मान देता था और इसीलिए वह बुद्ध के घोड़े और सवार होकर कपिलवस्तु की ओर लौटने के बजाय  पैदल लौटा।
   बिना सवार का घोड़ा भगवान बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण का प्रतीक बन गया तथागत गौतम बुद्ध ने अपने जीवन की इस अति महत्वपूर्ण घटना को श्रद्धा एवं सम्मान प्रदर्शित करने के लिए बुद्ध अनुयाई द्वारा विपिन बौद्ध विहारों और स्तूप मैं बिना सवार के घोड़े को उत्कीर्ण किया गया। यह प्रतीक चिन्ह सम्राट अशोक सम्राट कनिष्क और मेघवाल शासन काल तक बहुत ही प्रभावी रूप से दिखाई देता हैं।
               इसके बाद तथा महायान के उदय होने के बाद भी इस पवित्र प्रतीक के उत्पीड़न श्रद्धा में कोई कमी हमें नहीं दिखाई देती है बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा आज भी इसे अपना धार्मिक प्रतीक चिन्ह बना हुआ है अतः यह स्पष्ट है कि यह मेघवंशी समाज के आराध्य स्थलों मैं रामदेव जी से पहले भी बिना सवार के घोड़े वह पदचिन्हों की पूजा की जाती है जो बौद्ध धर्म के प्रतीक चिन्ह है आजकल बाबा रामसापीर के चित्र लोकप्रिय है जिसमें घोड़े पर स्वयं रामदेवजी सवार है तथा आपके आसपास मौजूद शक्तियों का चित्रण किया गया है वह भी सिद्धार्थ के राजसी सी जीवन को त्याग कर जाते समय की नकल सी लगती है। 
     गांधार शैली की पत्थर पर पर उत्कृष्ट यह कलाकृति पाकिस्तान के लाहौर म्यूजियम में आज भी सुरक्षित है, साथ ही धार्मिक स्थल रामदेव जी के मंदिर में बिना सवार के घोड़े पत्थर पर बने चिन्ह नजर आते हैं उदयपुर शहर के सायरा के पास जेमली गांव में बिना सवार और घोड़ा पद चिंह हैं।
     यह लगभग 2000 साल पूर्व का है जब बौद्धिष्ट अलख गमन करते हुऐ, जरगाजी से मिले थे।
               आज से करीबन 2000 वर्ष पूर्व जब अलख धणी जरगाजी से मिले थे, तो ढोल गाँव होते हुए, कमोल गांव के जरगा अम्बा से जेमली आये थे और वहां से जरगाजी पंहुचे, इस कारण जेमली में आज भी पत्थर पर घोड़े के पाँव का निशान हैं। आज भी ढोल गांव से रामदेवजी की सेवा आती है, रामदेवजी से पूर्व यहाँ पगलिया लेकर आते थे और जेमली से जरगाजी जाते थे।

              परपंरा के अंतर्गत ढोल की सेवा जेमली से होकर जरगाजी पहुंचती हैं, इस वर्ष भी ढोल गांव की सेवा 16 फरवरी 2023 को रवाना होगी और 16 फरवरी 2023 की रात को कमोल (जरगा आंबा)  रुकेगी, कमोल से रवाना होकर 17 फरवरी 2023 जेमली में रुकेगी और 18 फरवरी  2023 जेमली से गायफल होकर जरगाजी पहुंचेगी। 
19 फरवरी 2023 को जरगाजी मेला भरेगा।।


 


परपंरा के अंतर्गत ढोल की सेवा जेमली से होकर जरगाजी पहुंचती हैं, इस वर्ष भी ढोल गांव की सेवा 13 फरवरी 2026 को रवाना होगी और 13 फरवरी 2026 की रात को कमोल (जरगा आंबा)  रुकेगी, कमोल से रवाना होकर 14 फरवरी 2026 रात्रि जेमली में रुकेगी और 15 फरवरी 2026 जेमली से गायफल होकर जरगाजी पहुंचेगी। 


नया स्थान मेला – 16 फरवरी 2026
जूना स्थान मेला – 15फरवरी 2026



ढोल की सेवा लाइव जेमली 03 मार्च 2019











 नोट :-जरगाजी पहाड़ में रघुनाथ पीर का परचा और इतिहास कृपया फोटो में देखें। और अधिक जानकारी के लिए  कृपया मुझसे संपर्क करें। 
जरगाजी का इतिहास रामदेवजी इतिहास से बहुत पुराना हैं। 


                                      प्रकाशमान सिंह बावल बौद्ध 







मेघवाल जरगाजी मुख्य मंदिर (छतरी )